अहमदाबाद: शहर में सड़क विस्तार और सड़क लाइन के नाम पर संपत्तियों को प्रभावित किए जाने के बीच गुजरात हाईकोर्ट ने लंबे समय से किसी संपत्ति में रह रहे किरायेदारों और कब्जेदारों के अधिकारों को लेकर महत्वपूर्ण आदेश पारित किया है। कोर्ट ने अहमदाबाद म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन को निर्देश दिया है कि वह प्रभावित संपत्तियों में लंबे समय से रह रहे लोगों की स्थिति और उनके अधिकारों की उचित जांच करे तथा कानून के अनुसार मुआवजे पर निर्णय ले।
यह आदेश हरभजन वासु बनाम गुजरात राज्य मामले में 17 अगस्त 2026 को पारित किया गया। मामले में याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता नीतीश नायर उपस्थित हुए।
50 साल से अधिक समय से संपत्ति में रहने का दावा
मामला अहमदाबाद के रायपुर दरवाजा के पास स्थित पुराने बाजार से जुड़ा है। खाड़िया वार्ड में आने वाला यह बाजार कपड़ा, पतंग और अन्य मौसमी सामानों के कारोबार के लिए जाना जाता है। याचिकाकर्ताओं के मुताबिक वे संबंधित संपत्तियों में 50 वर्षों से अधिक समय से रह रहे हैं और उनका कब्जा चला आ रहा है।
सड़क विस्तार और सड़क लाइन के कारण इन संपत्तियों के प्रभावित होने की आशंका के चलते अहमदाबाद नगर निगम ने संबंधित व्यापारियों को नोटिस जारी किए थे। इसके बाद व्यापारियों ने नगर निगम की कार्रवाई को गुजरात हाईकोर्ट में चुनौती दी।
याचिकाकर्ताओं ने अदालत के समक्ष यह भी बताया कि प्रस्तावित सड़क विस्तार से उनकी संपत्ति के साथ-साथ उनके व्यवसाय और आजीविका पर गंभीर असर पड़ सकता है।
नगर निगम ने कहा : याचिकाकर्ता मालिक नहीं, किरायेदार या कब्जेदार हैं
सुनवाई के दौरान अहमदाबाद नगर निगम की ओर से यह दलील दी गई कि याचिकाकर्ता संबंधित संपत्तियों के मालिक नहीं हैं, बल्कि केवल किरायेदार या कब्जेदार हैं।
हालांकि, हाईकोर्ट ने इस पहलू को महत्वपूर्ण माना कि याचिकाकर्ता संबंधित संपत्तियों में लंबे समय से रह रहे हैं। अदालत ने इस तथ्य पर भी गौर किया कि कई दशक पहले के किरायेदारी समझौते आज की तरह अनिवार्य रूप से पंजीकृत नहीं होते थे।
इसलिए केवल सरकारी रिकॉर्ड में मूल मालिक का नाम दर्ज होने के आधार पर लंबे समय से संपत्ति में रह रहे लोगों की स्थिति और उनके हितों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
नगर निगम को जांच और दोनों पक्षों को सुनने का निर्देश
न्यायाधीश निखिल एस. करियेल ने अहमदाबाद नगर निगम को याचिकाकर्ताओं की संपत्ति में स्थिति और अधिकारों की उचित जांच करने का निर्देश दिया।
कोर्ट के निर्देश के अनुसार:
- याचिकाकर्ताओं की संपत्ति में स्थिति और उनके अधिकारों की उचित जांच की जाए।
- याचिकाकर्ताओं और संबंधित संपत्ति के मालिक—दोनों को सुनवाई का अवसर दिया जाए।
- कानून के अनुसार याचिकाकर्ताओं को उचित मुआवजा देने पर विचार किया जाए।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि मुआवजा देने में कोई कानूनी बाधा आती है तो संबंधित पक्ष सक्षम न्यायालय से आवश्यक निर्देश प्राप्त कर सकते हैं।
सिर्फ ‘मालिक नहीं हैं’ कहकर मुआवजे से बाहर नहीं किया जा सकता
इस आदेश का सबसे महत्वपूर्ण पहलू लंबे समय से संपत्ति में रह रहे किरायेदारों और कब्जेदारों के अधिकारों से जुड़ा है।
सड़क विस्तार या सड़क लाइन के कारण किसी संपत्ति के प्रभावित होने की स्थिति में संबंधित व्यक्ति को केवल इस आधार पर कि वह संपत्ति का मालिक नहीं है, मुआवजे के सवाल से पूरी तरह बाहर नहीं किया जा सकता। उसकी वास्तविक स्थिति, लंबे समय से चला आ रहा कब्जा और संपत्ति में उसके कानूनी हित की उचित जांच आवश्यक है।
हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि प्रत्येक किरायेदार या कब्जेदार को स्वतः संपत्ति के मालिक के बराबर मुआवजा मिलने का अधिकार मिल गया है। मुआवजे का अधिकार संबंधित व्यक्ति की वास्तविक और कानूनी स्थिति तथा लागू कानून के आधार पर तय किया जाना होगा।
छोटे दुकानदारों और पुराने कारोबारियों के लिए अहम
अहमदाबाद जैसे तेजी से विस्तार कर रहे शहर में सड़क चौड़ीकरण और इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं के कारण बड़ी संख्या में पुरानी दुकानें और मकान प्रभावित होते हैं। ऐसे में दशकों से एक ही स्थान पर कारोबार कर रहे छोटे व्यापारियों और परिवारों के लिए यह आदेश महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
कई मामलों में दुकान या मकान का सरकारी रिकॉर्ड किसी अन्य व्यक्ति के नाम हो सकता है, जबकि वास्तविक रूप से कोई किरायेदार या परिवार लंबे समय से वहां रहकर अपना व्यवसाय चला रहा होता है।
हाईकोर्ट के आदेश से यह स्पष्ट संकेत मिलता है कि ऐसी स्थिति में प्रभावित व्यक्ति की वास्तविक स्थिति और उसके कानूनी हित की जांच किए बिना केवल रिकॉर्ड में दर्ज मालिक के आधार पर निर्णय लेना उचित नहीं होगा।
अहमदाबाद में डेमोलिशन ड्राइव को लेकर विवाद
अहमदाबाद में पिछले कुछ समय से सड़क विस्तार और अन्य विकास परियोजनाओं के लिए होने वाली डेमोलिशन कार्रवाई को लेकर राजनीतिक और सामाजिक विवाद भी सामने आते रहे हैं।
स्थानीय नागरिकों और विभिन्न संगठनों द्वारा ऐसी कार्रवाई के खिलाफ “मारू घर, मारू स्वाभिमान” और “घर आंदोलन” जैसे अभियान चलाए जा रहे हैं। वहीं, नगर निगम की बोर्ड बैठक में कांग्रेस पार्षद हितेंद्र पीथड़िया द्वारा कथित “भूतिया डेमोलिशन” का मुद्दा उठाए जाने और कार्रवाई के खिलाफ ठोस कदम उठाने की मांग किए जाने का भी उल्लेख सामने आया है।
डेमोलिशन से प्रभावित लोगों का कहना है कि विकास परियोजनाओं के साथ-साथ उनके आवास, व्यवसाय और आजीविका के अधिकारों की भी रक्षा की जानी चाहिए।
विकास के साथ प्रभावित लोगों के अधिकारों की रक्षा भी जरूरी
गुजरात हाईकोर्ट का यह आदेश सड़क विस्तार परियोजनाओं में प्रभावित लोगों के अधिकारों को लेकर एक महत्वपूर्ण न्यायिक हस्तक्षेप के रूप में देखा जा सकता है।
शहर का विकास और सड़क विस्तार सार्वजनिक हित में हो सकता है, लेकिन ऐसी कार्रवाई कानून और उचित प्रक्रिया के तहत की जानी चाहिए। दशकों से किसी संपत्ति में रह रहे व्यक्ति की स्थिति को केवल “किरायेदार” या “कब्जेदार” कहकर समाप्त नहीं किया जा सकता।
प्रभावित व्यक्ति की वास्तविक स्थिति, उसके लंबे समय से चले आ रहे कब्जे, संपत्ति में उसके कानूनी हित और उसकी आजीविका पर पड़ने वाले प्रभाव को कानून के अनुसार जांचना और मुआवजे के दावे पर उचित निर्णय लेना आवश्यक होगा।
(कलीम सिद्दीकी एक्टिविस्ट और वरिष्ठ पत्रकार हैं।)